एक अपरिचित सा लोकतंत्र .
शासन का षडयंत्र
जनता पर परातंत्र
अतीत की छुर्रिया
भविष्य का भयानक एहसास...
जूझता एक शराबी,
शबाबी और आम आदमी
दिन -प्रतिदिन, क्षण-प्रतिक्षण बार बार
डंसता एक महंगाई का साँप...
गरिमा को ललकारता
आतंकवाद का कीड़ा..
रोटी को तड़पाती बेरोजगारी
पाप-पुण्य, न्याय-दण्ड
धर्माधर्म, क्षमा शील
से बन्दर को नचाता एक नेता..
अरे लोकतंत्र यह कैसा है षडयंत्र
मै सोचता हूँ कुछ करे
आज का लोकतंत्र बोलता है कर के दिखा..
इस नागपाश को देखकर
अब सिर्फ अंकुर है, मन है
और संशय है
अब तो खुद का पता भी लापता है
इस अपरिचित से लोकतंत्र में....