चाहत एक चाय की, बहाने बहुत थे हर राह में ढहरने के, वक्त भी ठहर सकता था मगर मै नहीं ठहरा बढ़ता गया, एक चटोरी चीभ को लिए ऐसे की जैसे जिंदगी ढूढ़ने निकला हूँ अजीब थी उस एक चाय की चाहत भी... एक नुक्कड़ था, और स्टोव में रखी पिचकी सी एक पतेली जिसमे चाय है, और उसकी हलकी हलकी उबाल, "उबाल" भी है ऐसे मानो "जिंदगी पका" रहा हो चाचा की चाय में वो थोड़ा "चीनी" और थडी "खुशिया" मिलाना मानो हर रोज एक नयी जिंदगी की नयी शिप सी बन गयी हो... सच में अजीब थी उस एक चाय की चाहत भी... मगर जिंदगी अब तो चाय से काफी हो गयी, पैसा चमकने लगा रिश्तो में जंक लग गयी, हर चाहत शांत और चोट किताब हो गयी, नुक्कड़ में शराब की दुकान और जिंदगी नौकरी में खाक हो गयी बस अब हर 'युगल' की एक चाहत है चाय की खुशियों की चीनी और जिंदगी के उबाल की... आज फिर से है चाहत एक चाय की...