बेरोजगार घोड़ा कभी शान था राजा का, महाराजा का सेवक था, निःस्वार्थ और बफादार बेधड़क नाचता था सगाई में, सहनाई में, फिर खुद कमाता था, खाता था और युगल को भी खिलाता था. मेहनती था, मेहनत करता था, आज भी करता है मगर आज वो बेरोजगार है, मोटर गाड़िया आ गयी है गाँव में अब, सूरत में घोड़ा गाड़ी से अच्छी दिखती है मगर आनंद का पता नहीं, थोड़ा प्रदूषण भी आ गया है साथ में मगर युगल को क्या ? कुछ इंसानो को रोजगार भी मिल गया है खुश है अब कुछ लोग मगर घोड़ा गाड़ी से घोड़ा अलग हो गया है अब गाड़ी अब खलियान में खड़ी है, कुछ बोझा लिए अकेले और घोड़ा अकेला है अब बेचारा बेरोजगार।