एक लड़की तो वो भी है... रातो में जागने का शौक नहीं था मगर उसने इसे अब आदत बना लिया... बस एक नाम का शौक था, मगर अब पहचान कुछ और बन गयी... हर शाम "सूरज" निकलता है, हर रात दिन होताहै...उसका हाँ एक लड़की तो वो भी है... यहाँ पत्थर के भगवान का तो ध्यान है, मगर एक अबला के लिए सब हैवान है, रोज एक नया इम्तेहान लेती है जिंदगी उसका, मगर सारे सवाल बिना जबाब के होते है उसके... हाँ एक लड़की तो वो भी है... खुद शराब चढ़ाकर, उतारते है उस पर, जिस पर एक बीमार बाप और बूढी माँ की जिंदगी का सबाब है.. खुद की कसम 'खा' कर भूखी सोती है, मगर माँ-बाप की जिंदगी के लिए हमेशा रोती है... एक लड़की तो वो भी है... रात भर सिगरेट से भरे बार में नाचती और गाती है, हमेशा खुद बहुत रोती है, मगर बाप को कैंसर में और, माँ को बुढ़ापे में भी अपनी 'वाणी' से खूब हसाती है न जाने कैसे निभा रही है वो अपनी जिंदगी... जिंदगी के साथ, जहाँ कोई 'युगल' भी न चल पाए उनके साथ, लोग कुछ भी कहे मगर अब डरती नहीं है वो हाँ एक लड़की तो वो भी है... बहादुरहै... खामोशहै... ईमानदारहै... एक बेटी है... जो माँ-बाप का ख्याल रखती है, न जाने... न जाने कितनी हिम्मत है उसमे...