
आज फिर मजाक बना है,
उसके गाँव का एक किसान मरा है,
कल तक जब
कड़-कडाती धूप,
थर-थराती सर्दी,
गड-गड़ाती बरसात
में
बिना गमझे,
बिना छाता
बिना चप्पल
बिना कम्बल
पैदल उस खेत में जाता था,
जहाँ की दाल और अनाज
से
तुम्हारी थाली में खाना सजता है,
आज फिर उसका मजाक बना है...
जब तक वो था,
उस पर सब भारी थे,
तुम्हारे खाने का मालिक होकर भी
किसी मालिक का नौकर था,
कल सबके लिए खाना उगा पाए,
कभी कभी खुद भूखा सोता था,
तब कोई न
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