जो ज़ुल्म देख कर ना खौले वो ख़ून नहीं होता
सन्नाटा है ग़ुलामी की नींद में सुकून नहीं होता
उसे क़यामत की हद तक चाहो तो कुछ बात बने
वो इश्क़ नहीं रवायत है जिसमें जुनून नहीं होता
मशीनो के शोर में खिलोने दब गए
कारख़ाने में लगा बच्चा मासूम नहीं होता
बेकार है तेरा ना समझ पाने का बहाना
ख़ून से लिखे ख़त का मजमून नहीं होता
खरोंचा है मेरी रूह को उसने बड़ी अदाकारी से
ज़बान के मुक़ाबिल ख़ंजर कोई नाख़ून नहीं होता
बिका जो सरे-बाज़ार तो कुछ तन्हाई दूर हुई
जब तक तमाशा ना हो लोगों का हुजूम नहीं होता
अब ज़रूरत, ताक़त और क़िस्मत पे चलती है
दुनिया जंगल हो गयी, जंगल का क़ानून नहीं होता
Ruhsafir