चाहत एक चाय की,
बहाने बहुत थे
हर राह में ढहरने के,
वक्त भी ठहर सकता था
मगर मैं नहीं ठहरा
बढ़ता गया,
एक चटोरी चीभ को लिए...
ऐसे की जैसे जिंदगी
ढूढ़ने निकला हूँअजीब थी
उस एक चाय की चाहत भी!
एक नुक्कड़ था,
और स्टोव में रखी
पिचकी सी एक पतेली
जिसमे चाय है,
उसकी हलकी हलकी उबाल,
"उबाल" भी है ऐसे
मानो "जिंदगी पका" रहा हो
चाचा की चाय में वो
थोड़ा "चीनी"और
थोड़ी "खुशियाँ" मिलाना
मानो हर रोज
एक नयी जिंदगी की
नयी शिप सी बन गयी हो..
सच में अजीब थी
उस एक चाय की चाहत भी,
मगर जिंदगी अब तो
चाय से कॉफी हो गयी,
पैसा चमकने लगा
रिश्तो में जंग लग गयी,
हर चाहत शांत
और चोट किताब हो गयी,
नुक्कड़ में शराब की दुकान और
जिंदगी नौकरी में खाक हो गयी...
बस अब हर 'युगल' की एक चाहत है
चाय की
खुशियों की चीनी और
जिंदगी के उबाल की...
आज फिर से है
चाहत एक चाय की...

