व्याप्त आकाश चहुँओर ,
ढूँढता व्यक्तित्व को,
ना तमस में ना किरण में ,
ना जल ना अगन में,
ना भूमि ना अनिल में,
ना विरक्ति ना लगन में,
स्वयं की गहराइयों में,
खोजता मैं स्वयं को ,
व्याप्त आकाश चहुँओर ,
ढूँढता व्यक्तित्व को...
रहस्य है ये सघन कितना,
घोर श्याम अंत जितना,
मृत्यु के पटल पे आकर,
खोजता अमरत्व को,
व्याप्त आकाश चहुँओर ,
ढूँढता व्यक्तित्व को.....
