सोच के समंदर में डूबता हुआ मैं,

लमहों को पलकों पे फेरता हुआ मैं,

कुछ मीठा कुछ कड़वा था स्वाद उन पलों का,

वो देख आंसुओं से भीगता हुआ मैं....

सोच के समंदर में डूबता हुआ मैं,

लमहों को पलकों पे फेरता हुआ मैं...


हालात का ना डर था, ना थी दुखों से यारी,

था बस ख़ुशी से नाता, कोसों थी ज़िम्मेदारी,

बेपरवाह बचपने में, झूमता हुआ मैं,

सोच के समंदर में डूबता हुआ मैं,

लमहों को पलकों पे फेरता हुआ मैं...


सर्दी के उन सवेरों की धूप थी सुहानी,

हर रोज़ ताज़गी थी हर पल नयी कहानी,

यादों के इस चमन को, सींचता हुआ मैं,

सोच के समंदर में डूबता हुआ मैं,

लमहों को पलकों पे फेरता हुआ मैं...


कुछ वक्त और गुज़रा, कुछ उम्र और गुज़री,

हालात के मकाँ में, तनहाइयाँ सी पसरी,

पा के जहां की दौलत, खोता सुकूँ गया मैं,

ये देख आंसुओं से भीगता हुआ मैं,

सोच के समंदर में डूबता हुआ मैं,

लमहों को पलकों पे फेरता हुआ मैं......