कई हज़ार अल्फ़ाज़ों का ,असर दिखा जाती है,
ये ख़ामोशी की जुबां, कितने गुल खिला जाती है ,
मोहब्बत का क़ुबूल हो, या हो नफ़रत का इशारा,
शरारत की हंसी हो, या ख़याल हो तुम्हारा ,
बिना कुछ कहे भी दिल का ,हर पैग़ाम दे जाती है,
ये ख़ामोशी की जुबां, कितने गुल खिला जाती है ....
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बड़े काम की है ये तनहाइयाँ...
सवालों के जवाब दिला देतीं हैं,
ज़िंदगी का अहसास करा देती हैं,
भीड़ की वहशत भुलाकर, ख़ुद के पास ला देती हैं,
बेचैनी है इस ज़माने का चेहरा फिर भी,
इस कश्मकश भरी ज़िन्दगी में,
सकूँ का आफ़ताब खिला देती हैं,
बड़े काम की है ये तनहाइयाँ...
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छोड़ ना यार जाने दे...
बदक़िस्मती की लात हो, बिगड़े सब हालात हो,
सब देखे नया सवेरा फिर भी, तेरे लिए बस रात हो,
हंस ले थोड़ा दो पेग मार, मत मायूसी को आने दे,
छोड़ ना यार जाने दे...
थोड़ा कड़वा थोड़ा फीका, जीने में ना कोई स्वाद हो,
कितनी बातें रखी दिल में, कहने को ना कोई साथ हो,
ख़ुद बन जा अपना दीवाना, हर ग़म में ख़ुशियाँ आने दे,
छोड़ ना यार जाने दे...
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इक रात शत्रु बैठा ऊँचाइयो में घुसकर,
इस देश के मुकुट को पेरों तले दबाने,
माँ भारती के शेरों ने की विराट गरजन,
बढ़ते रहे निरंतर निज शीश को कटाने,
घनघोर काल रात्रि,भीषण कठिन चढ़ाई,
कर नाद जय भवानी, माँ भारती छुड़ाई,
इक रात शत्रु बैठा ऊँचाइयो में घुसकर.....
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घर के बाहर से जिंदिगी ने ,
कहीं दूर से आवाज़ दी ,
आओ मुझसे मिलने कभी,
तहेदिल से दरखास्त की,
पलकें उठाकर जो देखा वहाँ,
बस ख़ामोशी आबाद थी,
बड़ी देर समझ आया माजरा,
की वो कुछ और नहीं,
मेरे दिल की ही आवाज़ थी....
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पैरों की ठोकर देख ,
दर्द ने ठहाका लगा दिया ,
हमने दिल खोला ,
तो दर्द शर्मसार हो गया,
वो जो रहते ना थे ,
बिना मेरे एक पल चैन से,
देख उनको ग़ैर के साथ,
दर्द भी कराह गया,
पूछा मुझसे ,
कैसे ज़िंदा है तू इस ग़म के साथ ,
हमने पैरों की ठोकर को ,
अपना रहनुमा बता दिया....
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