गुड़ की डली को मुँह में रखकर,
राज भोग बताती है,
खुद पानी से भूख मार,
कुनबे को अन्न खिलाती है,
कितनी रातें वो जाग जाग,
खुद नींद मेरी बन जाती है,
उस कुटिया में बैठी वो हरदम,
मेरी खैर मनाती है,
वो प्यारी माँ मेरी ,
मुझे बहुत याद आती है...
गुड़ की डली को मुँह में रखकर,
राज भोग बताती है,
खुद पानी से भूख मार,
कुनबे को अन्न खिलाती है,
कितनी रातें वो जाग जाग,
खुद नींद मेरी बन जाती है,
उस कुटिया में बैठी वो हरदम,
मेरी खैर मनाती है,
वो प्यारी माँ मेरी ,
मुझे बहुत याद आती है...