नहीं इतना भंगुर मैंनहीं इतना कोमल,

के जीवन संघर्षों से घबरा मैं जाऊँ,

कालकूट गरल सी हो ,परिस्थितियाँ निर्मित,

बन महाकाल कैलाशी,उस विष को पी जाऊँ

नहीं इतना भंगुर मैंनहीं इतना कोमल,

के जीवन संघर्षों से घबरा मैं जाऊँ....


खुद राम ने भी त्यागेसुख राज्य भोग सारे,

कर्तव्यों के पथ पे , माँ पिता पत्नी हारे,

उफ़ तक नहीं किया ,हर घाव पी लिया,

बस यही है मंशाकण मात्र राम हो जाऊँ,

नहीं इतना भंगुर मैंनहीं इतना कोमल,

के जीवन संघर्षों से घबरा मैं जाऊँ....


थीं वज्र सी कठिनसौ चुनौतियाँ हर दिन,

एक निर्दयी सा छलवर्षों का घोर वन,

हर परीक्षा के क्षण मेंपांडव कभी ना हारे,

फिर क्यूँ तुच्छ लहरों सेभयभीत मैं हो जाऊँ,

नहीं इतना भंगुर मैंनहीं इतना कोमल,

के जीवन संघर्षों से घबरा मैं जाऊँ....