चल रहा काली रात का सफ़र,
है छाया अंधेरा घना इन राहों में ,
हूँ बिखरा हुआ हर तरफ़ से फिर भी,
समेटा हुआ है ,ज़िंदगी को बाहों में...
हो जाएगी मंज़िल आसां एक दिन,
मिल जाएँगे चैन के दो पल एक दिन,
फिर आएगी बारिश इस गर्म रेत पर,
हो जाएँगे तर हम, बहारों से एक दिन ..
है संजोया ख़्वाबों में आज भी वो शहर ,
जिसे माँगते रहे बेइंतेहाँ हम दूवाओँ में,
हूँ बिखरा हुआ हर तरफ़ से फिर भी,
समेटा हुआ है ,ज़िंदगी को बाहों में,
चल रहा काली रात का सफ़र ......


