ये जज़्बात है साहब,
उमड़ ही आते है,
जैसे सावन के बादल,
कहीं दूर से चले आते है,
ना कोई शख़्स यहाँ,
जो बच सका इनकी पनाहों से,
बस एक वो समाँ चाहिए,
और अश्क़ निकल ही आते हैं,
ये जज़्बात हैं साहब ,
उमड़ ही आते हैं.......
एक उम्र तक रहकर अपनो के पास ,
वो मजबूरियाँ जिंदिगी की कर देती है उदास,
खड़े होने अपने पैरों पे,
बन जाने को कुछ ख़ास,
अपनो से दूर होके वो अश्क़,
फिर निकल आते हैं ,
ये जज़्बात हैं साहब ,
उमड़ ही आते हैं......
खोना उस एक ख़ास को,
जब नसीब हो जाता है,
ख़ुद के इश्क़ से बड़ा,
जब उनकी ख़ैरियत का एहसास हो जाता है,
कभी कही तनहायी में याद कर उनको,
अश्क़ फिर निकल आते हैं,
ये जज़्बात हैं साहब ,
उमड़ ही आते हैं.....


