हर रोज़ आइने में एक अक़्स देखता हूँ, 

उस ओर खड़ा ,वो शख़्स देखता हूँ ,

सोचा, कल दिखेगा वो शख़्स ख़ुशनुमा,

पर जब देखता हू, तार तार देखता हूँ ,

हर रोज़ आइने में एक अक़्स देखता हूँ....

हर सुभा घूरकर आसमान देखता मैं,

हर रोज़ रोशनी की , राह देखता हूँ,

हो ना जाऊँ सर्द, इस फ़र्ज़ की हवा में,

जलाकर ख़ुद को , वो आग सेंकता हूँ,

हर रोज़ आइने में एक अक़्स देखता हूँ, 

उस ओर खड़ा ,वो शख़्स देखता हूँ ....

हर दिन नए सवालों से जूझता हुआ मैं,

हर शाम हारकर, अपने घर लौटता हूँ,

चल रहा ये कैसा तूफ़ाँ कश्मकश का,

मिल जाए थोड़ी राहत वो आस देखता हूँ,

हर रोज़ आइने में एक अक़्स देखता हूँ, 

उस ओर खड़ा ,वो शख़्स देखता हूँ .....

मुश्किलों की बारिश में भीगता हुआ मैं,

ख़ामोश बंद होंठो से चीखता हुआ मैं,

जिंदिगी के पिंजरे में पंख फड़फड़ाता,

खुद के लिए सुकूँ का वो वक़्त ढूँढता हूँ,

हर रोज़ आइने में एक अक़्स देखता हूँ, 

उस ओर खड़ा ,वो शख़्स देखता हूँ ....


Ankur Agrahari

pen name - ख़ानाबदोश