
हर रात की तरह ही ,कुछ देर रुक गया मैं ,
कुछ देर ख़ुद को खोजा, कुछ देर खो गया मैं ,
कल की उधेड़ बुन में, उलझता चला गया मैं,
उस वक़्त को साँसो सा, खोता चला गया मैं ,
हर रात की तरह ही , कुछ देर रुक गया मैं ....
ख़्वाबों के चंद लम्हों से डूबकर जो निकला,
यादों की झील से फिर ,भीगकर मैं निकला,
उन मंज़रों का रिश्ता माज़ी से मेरे निकला,
छूकर हंसीं पलों को ,गुलज़ार हो गया मैं,
हर रात की तरह ही ,कुछ देर रुक गया मैं ,
कुछ देर ख़ुद को खोजा, कुछ देर खो गया
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