जिस्म खड़ा है भीड़ में फिर भी, दिल में पसरी तनहायी है ,

कैसा भीतर सन्नाटा है , कैसी ख़ामोशी छायी है...

सुनसान रास्ते मंज़िल के, मीलों चलना इन गलियों पे,

परछाई का भी साथ नहीं, अन्धेरी काली सड़कों पे,

ख़ुद को सुनने को तरस रहा, ख़ुद की आवाज़ ना आयी है,

कैसा भीतर सन्नाटा है , कैसी ख़ामोशी छायी है ...


बाहर से है, रौशन दुनिया, अंदर छाया है अँधियारा,

मैं राह देखता सूरज की, जो बाँटे मन का उजियारा,

हूँ डूब चुका ख़ुद में गेहेरा, फिर भी दिखती गहराई है,

कैसा भीतर सन्नाटा है , कैसी ख़ामोशी छायी है ...


हूँ सुनता ख़ुद की साँसो को, ख़ामोश अंधेरों में बैठा,

हूँ बेहेता साथ ख़यालों के, लम्हों को साँसों सा खोता,

बीते पल की यादों में गुम, आँख मेरी भर आयी है,

कैसा भीतर सन्नाटा है , कैसी ख़ामोशी छायी है ,

जिस्म खड़ा है भीड़ में फिर भी, दिल में पसरी तनहायी है ,

कैसा भीतर सन्नाटा है , कैसी ख़ामोशी छायी है...