आज फिर कुछ याद आया ,

एक लम्हा था जो बिता आया ,

कांधों पे टिका था सर उनका, 

पूरी रात फिर मैं उठ ना पाया,

आज फिर कुछ याद आया , 

एक लम्हा था जो बिता आया ....


रंग छा जाते थे उनके आने से,

हर महफ़िल हो जाती थी जवां,

आज भी याद है मासूमियत उनकी,

चाहते भी मैं जो कभी भुला ना पाया,

आज फिर कुछ याद आया , 

एक लम्हा था जो बिता आया ....


अर्सो से कटते हैं जो पल ये आज,

रातों के अंधेरों में हूं गुम मैं आज,

ढल जाती थी शाम उनके दामन में कभी,

उन सदियों से सवेरों को मैं जी आया,

आज फिर कुछ याद आया , 

एक लम्हा था जो बिता आया ....