मानव को समझना भी कहाँ संभव हुआ है |
बिगाड़ कर सब पूछता है, ऐसा क्यों हुआ है |
जो दिल से चाहा हुबहू वैसा ही हुआ है,
सीमेंट, प्लास्टिक, रसायन और धुआँ है |
~ अंकुर अग्रवाल


मानव को समझना भी कहाँ संभव हुआ है |
बिगाड़ कर सब पूछता है, ऐसा क्यों हुआ है |
जो दिल से चाहा हुबहू वैसा ही हुआ है,
सीमेंट, प्लास्टिक, रसायन और धुआँ है |
~ अंकुर अग्रवाल