हर दिवस तुम्हारा है |

तुमसे ही जग सारा है |


तुम पृथ्वी सम पोषण हो करती |

जड़, जीवों में चेतन भी भरती |

जीवन के हर तप में हो तपती,

फिर भी सूर्य सम दमकती |

है शीतलता चंद्रमा जैसी,

सागर सी अविरल प्रेम की धारा है |


हर दिवस तुम्हारा है |

तुमसे ही जग सारा है |


मेरे देश के संस्कार तुम्हीं से |

पूजा, पाठ, व्यवहार तुम्हीं से |

हो वैभव, ज्ञान, साहस की देवी |

शक्ति स्वरूपा हर रूप तुम्हारा है |


हर दिवस तुम्हारा है |

तुमसे ही जग सारा है |



~ अंकुर अग्रवाल