तत्व तुम सिखाओ, नाश सब अज्ञान हो |

हृदय तुम विराजो, प्रेम का संचार हो |


भभूत, भस्म, भांग, धतूरा सब तुम्हारे श्रृंगार है |

निर्लिप्तता स्वयं से ही, सबसे बड़ा अलंकार है |

जीवन में सबके अमृत भरकर, तमस और विष का रसपान हो |


तत्व तुम सिखाओ, नाश सब अज्ञान हो |

हृदय तुम विराजो, प्रेम का संचार हो |


अणु, रेणु, ग्रह, उपग्रह, कण-कण के रचयिता हो |

समस्त जगत के कर्ता भी, अंहकार के शोषक हर्ता हो |

क्षमा नित हम सब को करते, वैराग्य, भोलापन वरदान हो |


तत्व तुम सिखाओ, नाश सब अज्ञान हो |

हृदय तुम विराजो, प्रेम का संचार हो |



~ अंकुर अग्रवाल