स्वयं की प्रशंसा |

दूसरों की आलोचना |

कभी तो पडे़गा, इस मस्तिष्क को टोकना |


सब में कुछ कमियाँ |

खुद की सब अच्छाईयां |

अंतर्दर्शन कर जरा तो सोचना |

कभी तो पडे़गा, इस मस्तिष्क को टोकना |


कला में, कृति में और बातचीत में |

गलतियां ढूंढूँ हर एक चीज में |

उसी तराजू में अपने को भी तोलना |

कभी तो पडे़गा, इस मस्तिष्क को टोकना |


स्वयं की आलोचना सह ना सकुं |

दूसरों की किये बिना रह ना सकुं |

कहीं तो होगा, इस विडम्बना को रोकना |


बस देखुँ गुणों को, ना करूँ आलोचना |


by Ankur Aggarwal