उज्जैन की एक कॉलोनी है ऋषिनगर, जहाँ पर एक पुस्तके उद्यान है | उस उद्यान मैं तरह तरह के पेड़ है , एक छोटा सा गुलाब का बगीचा है, नए नए झूले हैं पर सबसे विस्मयकारी जगह है एक बड़ा सा कुआँ जिसके आसपास फेंसिंग की गयी है ताकि कोई बच्चा उसके आसपास न जा सके | उसको कुआँ बोलना थोड़ा अन्याय इसलिए होगा क्युकी वो बड़ा और फैला हुआ तो है पर इतना भी बड़ा नहीं है की उसे बावड़ी कहा जाए | पुस्तके उद्यान चारों तरफ से घरों से घिरा हुआ है और काफी खूबसूरत नजर आता है | उस उद्यान में रोज़ शाम के वक़्त एक रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ प्रमोद शर्मा अपने कुछ सेवनिवृत्र मित्रों के साथ वहां जाते हैं | कोरोना में उनकी श्रीमती का निधन होगया था जिससे वो काफी अकेले होगये हैं | बेटा साथ में ही रहता है पर नौकरी के कारण उतना समय नहीं दे पाता है | तो शर्मा जी का रोज़ का नियम है की शाम के वक़्त उद्यान में सेर करना और बेंच से बच्चों को खेलते हुए देखना| शर्मा जी बच्चों से बोहत बातें करते, स्कूल का नाम , घर का पता आदि आदि | क्युकी वो बच्चों के लिए रोज़ कुछ न कुछ मिठाई देते ही रहते हैं इसलिए बच्चे भी ख़ुशी ख़ुशी उनसे बातें करते और उनसे घुल मिल गए थे | वहां एक बच्ची श्यामा खेलने आती थी जो पास में ही एक ट्रेवल एजेंट की बेटी थी उम्र यही कोई ७-८ साल रही होगी | श्यामा शर्मा जी से रोज़ मिठाई लेने उनकी बेंच पर जाती और ढेर सारी इधर उधर की बातें करती | शर्माजी को भी श्यामा की बतकही अच्छी लगती थी | स्कूल में क्या हुआ, क्या खाना खाया वगैरह वगैरह पर एक सवाल जो श्यामा रोज़ शर्मा जी से करती थी वो ये की अंकल जी मम्मी कहती है उस कुँए में रूह है क्या सच में वहां रूह है ? शर्मा जी को समझ आता था की श्यामा बोहत शैतान है और वो कुँए के आसपास नहीं जाए इसलिए डराने को उसकी मम्मी ने ये कहानी बनायीं है | शर्मा जी हर बार उसकी बात टाल जाते पर हर दूसरे दिन श्यामा फिर वही सवाल करती क्या उस कुँए में रूह है ?

कुछ दिनों बाद शर्माजी शहर से कुछ दिनों के लिए बहार चले गए | कुछ दिन बाद जब वो आये तो आने में थोड़ी शाम हो गयी | उन्होंने खाना वगैरह खाया और फिर अपनी दिनचर्या के अनुसार उद्यान में बैठने चले गए | क्युकी अँधेरा हो गया था और उद्यान खाली था वो ज्यादा देर नहीं टहले और आकर बेंच पर बैठ गए | उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब श्याम कुएं के पास से दौड़ती हुई आयी और दूर से ही पुछा की अंकल जी क्या सच में कुँए में कोई रूह है ?शर्मा जी ने उसकी बात हँसते हुए टाल दी | श्याम वापस ही कुँए के पीछे चली गयी जहाँ से उसके घर की निकासी थी |

दूसरे दिन शर्मा जी को कहीं बहार जाना था तो उन्होंने ड्राइवर के लिए श्यामा के पापा को फ़ोन करके ड्राइवर देने का पुछा , सामने से उनके किसी रिश्तेदार ने फ़ोन उठाया और कहा की उनकी बेटी कल दिन में दिमागी बुखार से शांत हो गयी है, शर्माजी ने गुस्से में कहा क्या बकवास कर रहे हो कल रात ही तो मेने श्यामा को पुस्तके उद्यान में कुँए के पास देखा था पूछते हुए की क्या सच में कुएं में रूह होती है ?