कुछ दिनों पहले मैंने आल इंडिया रैंक का ट्रेलर देखा था, मैं अपनी कुछ पुरानी यादों मैं खो गया | कोटा फैक्ट्री देख कर भी वही ख्याल आये थे | मुझे याद आया कैसे मेरे घर वालों ने मुझे दसवीं की बाद उज्जैन मैं ही एक IIT की कोचिंग में डाल दिया था जबकि मुझे कुछ समझ भी नहीं थी की ये IIT है क्या | बात २००५-०६ की है तब मोबाइल आम आदमी के पास आया आया ही था | इंटरनेट के लिए लोग अभी भी कैफ़े पर ही निर्भर हुआ करते थे | इतनी मुश्किल पढ़ाई से सामना पहली बार ही हुआ था, इनऑर्गेनिक, आर्गेनिक केमिस्ट्री, फिजिक्स के H C Verma के बंदरो ने जो उत्पात मचाया था वो अलग ही था| ६-७ घंटे की क्लास स्कूल के बाद बेहद उबाऊ हो जाती थी| में २ साल कोचिंग को झेल भी इसलिए पाया था क्युकी मुझे पहली बार प्यार हो गया था और मेरा सारा वक़्त सिर्फ क्लास के बहाने किसी को देखने में ही चला जाता था , इसके लिए में अलग से एक पूरा वृतांत लिखूंगा | 

मुझे अपनी कोचिंग के दिन इसलिए याद आये क्यूंकि में अपनी कोचिंग के बाद से ही हीन भावना से भर गया था जिसने मेरा पीछा पूरी इंजीनियरिंग तक किया | उस कोचिंग के हेड हमको मैथ्स पढ़ाते थे और काफी मेहनत से उन्होंने वो कोचिंग स्थापित की थी - इसके किस्से हमलोगो ने बोहत सुने हुए थे की कैसे गरीबी से उन्होंने मुक़ाबला करके एक अलग मुक़ाम बनाया था | १६-१७ साल की उम्र बोहत ही नाजुक होती है और इस उम्र में आपको अगर कोई सक्सेसफुल व्यक्ति कुछ बताये वो एकदम ब्रम्ह वाक्य लगने लगता है | वो हमको हमेशा एक चीज़े बोलते थे की अगर तुम्हारा IIT NIT या स्टेट के सबसे अच्छे गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में नहीं हुआ तो तुम लोग नौकरी में बस 0 और O में अंतर ढूंढ़ते रह जाओगे (वो शायद कोई प्रोग्रामिंग लैंग्वेज की बात कर रहे होंगे ) | में भी सफलता का पैमाना इन्ही कॉलेज में एडमिशन को मानने लगा था | जब मेरा रिजल्ट आया था तोमेरा एडमिशन किसी भी गवर्नमेंट कॉलेज में नहि हुआ | मैंने फिर एक ड्राप लिया दूसरी कोचिंग से पर मेरे मार्क्स पहले से भी काम आये | मजबूरन मुझे उज्जैन के ही एक प्राइवेट इंस्टिट्यूट के आखरी कॉलेज में दाखिला मिला | मेरा मन कॉलेज में बिलकुल नहीं लगता था ऐसा लगता था में कोई बोहत ख़राब काम कर रहा हु मेरे सारे दोस्त मुझसे आगे निकल गए हैं | फिर मुझे ये भी लगने लगा था की शायद की अब मैँ कुछ भी अच्छा नहीं कर पाऊंगा | पर जब में तालाब का मेंढक कॉलेज से बहार निकला तब मुझे ये बात समझ में आयी की ये मेरे दिमाग की ही उपज है और इंसान के कॉलेज से उसकी सफलता का या असफलता का कोई महत्व नहीं होता है | अब जब भी में प्राइवेट इंस्टीटुए के स्टूडेंट्स का सिविल सेवा , आईआईएम , स्टार्टअप वगैरह में सफल होते हुए देखता हूँ तो लगता है काश में खुद को पीछे जाकर ये समझा पाता की मेहनत से ही सब कुछ संभव है |

अभी में एक आईटी कंपनी के मानव संसाधन विभाग में कार्यरत हूँ और पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ की ज्यादातर संस्थाएं आपको आपकी काबिलियत और समस्या हल करने की क्षमता को देख कर ही आपको काम पर रखती हैं, बड़ी संस्थाओ से पढ़ाई करके आना आपको एक फर्स्ट मोवेर एडवान्टेज जरूर देता हैं पर आपको अपनी मेहनत के कारण ही आगे की पहचान मिलती है | कोई भी विद्यार्थी जो इस तरह की भावना से दो चार हो रहा है , या उन्हें लगता है की वो किसी से भी कमतर है तो उनको सिर्फ खुद को बेहतर करने पर ध्यान देना चाहिए बाकी सब ठीक ही होगा | 

राम राम