
मेरे शब्दो के शोर ने,
मेरे अंतरमन में बसी तूम्हारी यादों की ख़ामोशी के परखचे उड़ा दिए,
और ये अच्छा ही हुआ,
और ये एक न एक दिन होना भी था,
आखिर ये ही तो वो मंजिल थी,
जिसे पाने की
आखिर ये ही तो वो मंजिल थी,
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