मेरे शब्दो के शोर ने, मेरे अंतरमन में बसी तूम्हारी यादों की ख़ामोशी के परखचे उड़ा दिए, और ये अच्छा ही हुआ, और ये एक न एक दिन होना भी था,9e712aacfb7ca24587dfb6e7ec3957bf आखिर ये ही तो वो मंजिल थी, जिसे पाने की लालसा में हमने इस सफर की सुरुआत की थी, अनोखा था ये सफर जो अपने अंजाम पर पहुच गया, कुछ उतार चढ़ाव जरूर थे आये, पर ये 11 साल पुराना कैदी आज आज़ाद है, थोड़ा थक सा गया है पर, मंजिल को पाने की ख़ुशी ने सारी थकान मिटा दी, ठीक उसी तरह, जिस तरह, मेरे शब्दो के शोर ने, मेरे अंतरमन में बसी तुम्हारी यादों की ख़ामोशी के परखचे उड़ा दिए.. तुम्हारे यादों का कैदी, आज आज़ादी का दामन थामे हुए : अंकित शर्मा