मेरे अवचेतन मन की उथल पुथल,
को जानने की चेस्टा में,
अक्सर ही पूछ बैठते मुझसे,
की कौन हो तुम.
तो मैं यही कह पता की,
मेरे कलम से निकलते शब्द हो तुम,
उन शब्दों की परिभाषा हो तुम,
उस परिभाषा में कैद कहानी हो तुम,
उस कहानी की प्रेरणा हो तुम,
कहानी का पहला शब्द,
और फिर आखरी पड़ाव भी तुम.
हां मेरे अवचेतन मन की उथल पुथल हो तुम,
जो ये पूछते है की कौन हो तुम.
उनके सोच से भी परे,
इस अनंत बह्रामंड का विस्तार भी हो तुम.
और तुममे खोज़ता खुद को मैं....
अंकित शर्मा....