दहशत में बीत रहीं,
इन रातों का हिसाब कौन देगा?
रचनाकार जो अब मौन हो गया,
जब खुद की परछाई से ही डर लगने लगे,
और फिर ये जीवन लड़खड़ा जाये तो सहारा कौन देगा?
धर्म का नकाब पहने,
हर इंसान में घर कर गया शैतान,
नफरत की आग फैलाये जा रहा,
तो अब शांति सन्देश कौन देगा?
दहशत में बीत रहीं रातों का हिसाब कौन देगा?
जो अब वो रातों में निकले,
उसके मान-सम्मान का पहरेदारी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
उसके दमन से निकलते चीखों,
उसमे छिपे सवालों के ज़वाब कौन देगा?
जब उदासी का कम्बल ओढ़े,
कोई छत से आज़ादी की छलांग लगाए,
उसे रोक के एक नई मुस्कराहट और  जीने की वजह कौन देगा?
ये तो इंसानियत मर चुकी है,
अगली को जन्म कौन देगा???