अरे सुनो ज़रा
ये अंतिम पत्र लिख रहा हूँ,
तुम जवाब मत देना,
वरना अंतिम शब्द की मर्यादा भंग हो जाएगी,
बस यु ही कुछ सवाल अधूरे रह गए थे,
पर मैं कोई सवाल नही पूछ रहा,
गर पूछ लिए तो तुम जबाव देने को बाध्य हो जाओगी,
फिर इस अंतिम शब्द का कोई महत्व नही रह जायेगा,
अबकी बार कोई सवाल नही,
बस कुछ बातें है,
बातें कुछ अधूरे रातों की,
जिनको गुजारा था तुमसे बातें किये बैगैर,
बातें उन लम्हो की भी,
जिनमे वो चाय का कप अकेला रह गया,
हिस्सा मांगने के लिए तुम नही थी,
बातें उन रास्तो की भी,
जिनपे चलते वक्त तुम्हारा हाथ न था थमने को,
ऐसी ही दो चार बातें और भी है,
पर अब मैं कुछ नहीं लिख रहा,
वरना तुम भी लिखने को बाध्य हो जाओगी,
फिर इस अंतिम शब्द की गरिमा पर सवाल खड़े हो जायेंगे,
इस खत के बाद ये कलम भी टूट जाएगी,
अक्सर इसी से तुम्हे खत लिख करता था,
पर अब ये फिर तुम्हारा नाम नही लिख पायेगी,
बस अब बरी है इस खत को डाकखाने में डालने की,
पर नहीं,
ये खत तुम तक नहीं जाएगी,
गर तुमने पढ़ लिया,
तो उत्तर देने के ले बाध्य हो जाओगी,
फिर इस अंतिम शब्द का अपमान हो जायेगा,
गर ये खत पढ़ के तुमने खत लिख दिया तो,
मैं भी तुम्हारे सवालों के जवाब देने को बाध्य हो जाऊंगा,
पर ये अंतिम खत है,
अंतिम ही रहने दो,
ये खत भी उस बक्से में बंद हो जायेगा,
जहाँ वो सरे खत बंद है,
जो मैंने कभी लिखे थे,
पर तुम्हे भेज न पाया,
आज ये अंतिम पत्र लिख रहा हूँ,
तुम जवाब मत देना.....
अंकित शर्मा