अधूरा...
ज़रा सुनो...
चलो आज़ एक कहानी सुनाता हूँ,
अधूरी सी है,
शायद तुम पूरी कर दो
एक रात की है ये बात,
जब फलक पर चाँद भी अधूरा था,
मेज़ पर वो आधी अधूरी पढ़ी किताब,
जिसके पन्नो से, हवाओं के झोखे खेल रहे थे,
उस आधी खुली खिड़की से आ कर,
वहीँ कही वो आधा कप कॉफ़ी का भी है,
मनो सबकी नजरें उसे ही देख रही हो.
उन सबसे नजरें छुपा कर,
वो लड़का, कुछ अधूरे से ख्वाब ले कर,
बंद आँखे कर, सारी रात जगता रहा....
अंकित शर्मा....


