नज़दीक आओ मेरे, एक राज तुम्हे बताऊ

जो कह न सका कभी, वो आज तुम्हे बताऊ

वो आज तुम्हे बताऊ.....


मुसलसल खोजने से, तो अपने कहा मिलते

गर धरा बन जाये रेत, तो फूल कहा खिलते

अंधेरी गली में लगाई, हर आवाज तुम्हे बताऊ

जो कह न सका कभी, वो आज तुम्हे बताऊ


चतुर चंचल चितवन के, चौकोर चौराहों से

खिल उठती निगाहे, मिलकर तेरी निगाहों से

चैन किस कदर पाया,ये अल्फाज़ तुम्हे बताऊ

जो कह न सका कभी, वो आज तुम्हे बताऊ


चलो बुझ रही आग को, थोड़ी सी हवा दे दी

मरीज़-ए-इश्क़ को, मुहब्बत की दवा दे दी

हर्ष उल्लास के अंकित का नाज तुम्हे बताऊ

जो कह न सका कभी, वो आज तुम्हे बताऊ

 (✍️रायसाहब अंकित)