अक्सर राह चलते लोग मेरे घर को पहले बंगला कहते थे तो गर्व से सीना फूल जाता था| सारे मोहल्ले में मुझे मेट्रिक पास डाँक बाबू के नाम से जाना जाता था|
पर आज लगता है मानो एक टूटे लैटर बॉक्स की तरह मैं घर के दरवाज़े पे लटका हूँ| उतरे लाल रंग सा, चारो तरफ लगी जंग सा, एक खोखले शरीर सा बस एक बेजुबान बक्सा| मेरी मौत का इंतज़ार घर में सभी को वैसे ही है जैसे उस टूटे लैटर बॉक्स को एक अदद चिट्ठी का| पर सच ये है जिसने जीवन भर सबको खुशियों की चिट्ठियां और ग़मो में टेलीग्राम पहुंचाए| आज वही एक निकम्मा बूढ़ा बाप कहलाता है, सींचा था जिस पौधे को लाडों से आज वही अपना मुझसे नज़रें चुराता है| दस्तखत मेरे नाम का कुछ कागज़ों पे होना है सुना था वकील को कहते हुए| उस दिन आँखों में पानी तो आया पर आँखें गीली नहीं हुई, शायद इसी को करम कहते होंगे सोच कर आँखें मूँद ली| अब तो बस एक टूटी चारपाई पे पड़ा ये बूढा अपनी पथराई आँखों से अपनी मौत को रोज बुलाता है| लगता है वो आ गयी, अरे ये तो हंस रही है अरे इसके हाथों में तो कलम और कागज़ हैं, अरे ये तो बिलकुल मेरे बेटे सी दिखती है| वो देखो मेरे प्राण मुझसे जुड़ा हो गए, मेरे मरे हाथों से भी लोग मेरे दस्तखत ले गए| आज घर में सुबह चिट्टी आई थी, शायद चिट्ठी नहीं मेरी वसीयत आई थी|