
अक्सर राह चलते लोग मेरे घर को पहले बंगला कहते थे तो गर्व से सीना फूल जाता था|
सारे मोहल्ले में मुझे मेट्रिक पास डाँक बाबू के नाम से जाना जाता था|
पर आज लगता है मानो एक टूटे लैटर बॉक्स की तरह मैं घर के दरवाज़े पे लटका हूँ|
उतरे लाल रंग सा, चारो तरफ लगी जंग सा, एक खोखले शरीर सा बस एक बेजुबान बक्सा|
मेरी मौत का इंतज़ार घर में सभी को वैसे ही है जैसे उस टूटे लैटर बॉक्स को एक अदद चिट्ठी का|
पर सच ये है जिसने जीवन भर सबको खुशियों की चिट्ठियां और ग़मो में टेलीग्राम पहुंचाए|
आज वही एक निकम्मा बूढ़ा बाप कहलाता है, सींचा था जिस पौधे को लाडों से आज वही
Read More! Earn More! Learn More!
