ये शहर कुछ जाना-पहचाना सा लगता है,
पर ना जाने क्यूं हर शख्श अंजाना सा लगता है|
ये घूरते है यूँ गिद्ध की नज़रों से,
बदन मेरा है पर हक़ इनका मालिकाना सा लगता है|
कोई ताने मारता है,
कोई चुनरी खींचता है;
जब कुछ बोलती हूँ मैं तो घर मेरा रोकता है|
डर लगता है मुझे रात के अँधेरे से अब,
नक़ाबपोश हर आदम यहाँ दु:शाशन सा लगता है|
कोई कहता है दिल्ली है ये,
कोई बम्बई बताता है;
पर अफसोस ये अब हर शहर का अफसाना नज़र आता है|
किस किस को कोसूँ और किसको दूँ मैं दोष यहाँ ,
मेरा ही जन्मा बच्चा अब सयाना सा लगता है|
वही लोग जो बोलते है दामिनी मुझे,
जवां पे उनकी भारत माता की जय कुछ दोगला सा लगता है|
वो कर देते हैं
यूँ फैसला मेरी ज़िन्दगी का तीन अल्फ़ाज़ों में,
खुदा से खुद उनका तलाक़ सा लगता है|
भूल जाते हैं वो जो कल पैदा हुए थे
मेरी जैसी ही कोख से,
बेटी का पैदा होना आज उनको नागवारा सा लगता है|
अरे शैतान भी रोता होगा ये देखकर,
हाथ में दबा बेटी का गला इनको मर्दाना सा लगता है|
ये जो निशाँ बने है मेरी पीठ पर,
वो भी छुपा लेती हूँ मैं| कभी रोती हूँ ,
कभी बिलखती हूँ;
इस दर्द से हर रोज़ गुजरती हूँ मैं|
पर मत भूलो ये तुम की;
मजबूत हूँ मैं मजबूर नहीं;
किसी द्रौपदी का चीर नहीं|
धरती हूँ मैं और आकाश भी,
मैं ममता भी,
मैं काली भी,
मैं लक्ष्मी बाई और रजिया भी|
जो जलूं तो मैं अंगार हूँ,
जो सौम्य हूँ तो श्रृंगार मैं|
मैं शब्द हूँ;
मैं शून्य हूँ,
मैं आदि हूँ और अंत हूँ मैं|
जो हर पल मोहब्बत देती हैं
वो औरत हूँ
वो माँ हूँ मैं|