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कब्र खोदने वाला

आसमां भी पिघल पड़ता है मेरी तक़दीर देखकर, मेरी पेशानी पे पड़ी लकीरें देखकर| लोग मरते हैं तो जीता हूँ मैं, जनाब क़ब्र खोदता हूँ मैं|
ज़मीं का क्या है, माँ है, अक्सर पत्थर बन जाती है लाशों को देखकर| अपने अश्कों से पत्थरों को भी तोड़ लेता हूँ, जनाब क़ब्र खोदता हूँ मैं| कोई जल्लाद, कोई अजराइल* तो कोइ यमराज कहता है देखकर| भूख से बिलखते बच्चों की सोचता हूँ , जनाब क़ब्र खोदता हूँ मैं| रूह काँप उठती है , जिस्म थर्रा उठता है, सुफैद चादर देखकर| डर लगता है तो कफ़न ओढ़ लेता हूँ , जनाब क़ब्र खोदता हूँ मैं| जिस मोड़ से मुँह मोड़ लेते है नाती और सब रिश्तेदार, बस वहीं तुझे ख़ुदा से जोड़ देता हूँ , जनाब क़ब
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