एक रात्रि अकेला जाग रहा था 

लिए हाथ में मधु प्याला 

चंदा इठलाकर हँस बैठा 

एक और आ गया मतवाला

तब हवा ने दस्तक दी गालों पर 

पूछा क्या तू है पीने वाला 

मैं हौले से मुस्का  कर बोला 

मैं तो हूं उसका दिलवाला

तारों ने फिर विस्मित हो 

एक विचित्र प्रश्न था पूछ लिया 

तू आशिक है या सुषविक है 

या है कहीं का रखवाला 

मैं हुआ मगन मन ही मन में 

एक ज़ाम और अंज़ाम दिया

गर्वित होकर बोला उनसे 

मैं उनके होठों की था मधुशाला 

सन्नाटे ने भी मौके का 

यूँ लाभ उठाकर पूछ लिया 

वह सनम तुम्हारा कैसा है 

पानी है आतिश है या है कोई जलधारा

अल्फाज खत्म थे होठों पर 

पर अन्तर्तम उपमाओं का दरिया था 

वो पानी है ना आतिश है 

ना है वह कोई जलधारा 

जलधाराओं का गंतव्य है वो 

कहता सागर जिसे जग सारा

बस स्मृतियां ही शेष बची है 

खो गई प्रेम की वह धारा

और उस प्रेम क्षीर का नीर हूं पीता 

कहते हो तुम जिसे मधु प्याला।।