बँध के मर्यादा में वो,
प्रीत के पथ पर चले।
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
प्रेरणा के दीप बनकर,
कर्म धागे में बँधे ।
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
वनवास भोगा मनुज बनकर,
ईश फ़िर भी बने रहे।
प्रीत का संदेश देकर,
विरह में जलते रहे।
ये संकल्पना नि:स्वार्थ प्रेम की,
प्रस्तुत प्रभू जग में किये।
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
मर्यादा को शीश धर कर,
निज कुटुम्ब उज्ज्वल किया।
मातृ पितृ और भ्रातृ प्रेम में,
अर्पित स्वराज्य को कर दिया।
अवधारणा ये त्याग की,
देकर स्वयं वन को चले।
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
भेदभाव को परे रखकर,
वानरों से बँध गये।
भक्ति का वरदान देकर,
भक्त खुद ही हो गये।
स्वामी जगत के होकर भी,
चाकर स्वयंभू हो चले
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
योजन समुद्र को पार कर,
निर्वाण रावन को दिया।
देकर विभीषण को अभय,
वरदान मुक्ति का दिया।
मित्रता का यह प्रसंग,
भगवान जग को दे चले।
राम खुद ही राम बनकर,
राम के पथ पर चले।।
-नि:शब्द
