प्रेम एक ऐसा शब्द है जो एक शब्द से कहीं ज्यादा है। यह एक ऐसी भावना है, जिसके वशीभूत व्यक्ति बिना सोचे अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हो जाता है। यह एक ऐसी भावना है जो त्याग समर्पण व सत्य का संदेश देती है।

परंतु आधुनिकीकरण के इस युग में प्रेम एक संकुचित मानसिकता मात्र बनकर रह गया है। दूसरी ओर युवा पीढ़ी ने इसके अस्तित्व को और भी छोटा वह संकुचित कर दिया है। आज वास्तव में रंग और रूप प्रेम की परिभाषा तय करते है। अर्थात जो सुंदर वह प्रेम के लायक और जो कुरूप उससे घृणा। 

एक बड़ी विडंबना में जी रहे हैं हम, अपितु सत्य तो यह है कि रूप की सुंदरता तो समय के साथ ढल जाती है जबकि मन की सुंदरता समय के साथ और भी पवित्र और निश्छल होती जाती है। जिसे Thomas Crew ने अपनी कविता The True Beauty में लिखा है।

दूसरी ओर युवा पीढ़ी ने इसी प्रेम को अपनी शारीरिक सुख एवं इंद्रियों के संतोष का माध्यम बना रखा है। जिसका उद्देश्य न तो समर्पण है, न त्याग, न सत्य इसका केवल एक ही उद्देश्य है वह है क्षणिक सुख। इस तथ्य का यह आशय कतई नहीं युवा पीढ़ी का एक दूसरे से प्रेम करना अपवित्र है। नि:संदेह दो समझदार व्यक्तियों को एक साथ जीवन जीने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। उन्हें अपनी पसंद व नापसंद जाहिर करने का अधिकार होना चाहिए। तथा परिवार एवं समाज को इस प्रेम को स्वीकार कर सम्मान व आदर भी देना चाहिए। परंतु आज प्रेम के वास्तविक अर्थ को समझे बिना ही हर व्यक्ति ने इसे अपने स्वार्थ के अनुसार ढाल लिया है इस प्रकार प्रेम के वास्तविक अर्थ को तो जैसे मुखाग्नि ही दे दी गई हो।

इस आधुनिक समाज में जिस प्रकार से प्रेम के रूप को प्रस्तुत किया गया है उसने हमारी मानवता, संस्कृति एवं हमारे धर्म पर कुठाराघात किया है 

कोई यह क्यों नहीं समझता की प्रेम वास्तव में वह मूल भावना है जो सृजन का माध्यम है। जो व्यक्ति को धर्म, सद्मार्ग एवं सत्य पर चलने की प्रेरणा देती है। संकुचित मानसिकता से दूर हट कर हमें प्रेम की एक व्यापक एवं परिष्कृत अर्थ को समझना होगा वह प्रेम जिसे राम ने अपनी मर्यादाओं में, श्री कृष्ण ने अपनी लीलाओं में तथा शेक्सपियर और थॉमस क्री ने अपनी कविताओं में उकेरा है क्योंकि भौतिक वस्तुओं का आधुनिकीकरण तो उत्तम है पर प्रेम का आधुनिकीकरण एक अभिशाप।