आज नयन हो कर उदास,
बह निकले दो अश्रु सहास।
प्रकृति का निर्मम मर्दन देख,
हुआ विनाश का अमिट आभास।।
यूं निर्दयता से परशु उठाकर,
शाखें मेरी ना नष्ट करो ।
मै पालक हूं तेरी साँसों की,
तुम खुद को ना यूँ भृष्ट करो।।
वायु, छाँव और जीवन भी,
तू मुझसे ही तो पाता है।
फिर भी क्यों तू हे नीच नर,
मेरे कर्तन से न सकुचाता है।।
ये वर्षा, नदियाँ और अन्न,
जो तेरा पोषण करते है।
मानव हो धन के वशीभूत,
मम् मर्दन से तृष्णा भरते हैं।।
इतनी सेवा के बदले मैं,
एक कौडी भी न लेती हूँ ।
हर मौसम के बाणों को सहकर,
हर क्षण तुझको सुख देती हूँ।।
एक दो दिन की बीमारी ने,
मोल मेरा समझाया है।
लेकिन स्वार्थ के सम्मोहन ने,
अब भी तुझको भरमाया है।।
हो जा सचेत हे मानव अब,
इस मर्दन को तू रोक यहीं।
गर ना चेता अब भी तू नर तो,
इस मृत्यू भोज को भोग यहीं।।
ये बीता कल ना लौटेगा ,
सो सीख यही सिखलाती हूँ।
मैं प्रकृति हूँ पालनकर्ता,
जीवन संगीत बज़ाती हूँ।।
समय शेष है सोच जरा तू,
अगली पीढ़ी की रक्षा कर।देकर उनको निर्मल जल वायु,
जीवन उनका भी अच्छा कर।।
यदि तृष्णाओं का ये पहाड़ ,जो आज नहीं तू त्यागेगा।
तो कौल तुझे है मेरा ये,
यम तांडव कर हर घर नाचेगा।।


