पावन हरित धरा को अब,
दूषित नहीं करो हे नर।
कितने सुन्दर हैं देखो ये,
झीलें नदियां और सरोवर।
मनुहर और रमणीक दृश्य,
ये प्रकृति दिखाती प्रति बेला।
मन्द पवन कहीं तेज़ हवायें,
संगम कैसा अलबेला।
हरित धरा है पाँव के नीचे,
ऊपर अतरंगी आकाश।
पंछी,पौधे,पेड़ पुष्प,
सब करते हैं इसमे निवास।
झम- झम बारिश वर्ष मे आकर,
सबको जीवन देती है।
ये प्रकृति मात है बड़ी दयालू,
बदले कुछ न लेती है।
प्रचंड ठंड कभी शुष्क ग्रीष्म,
और बसंत का ये संगम।
अंकुर देते बीज़ कहीं,
और कहीं विचरते विहंगम।
छाती चीर धरा की हम,
डाल बीज़ जीवन उपजाते।
इतना अनुग्रह धरती देती,
शब्द नहीं कुछ कह पाते।
फिर भी नित निज़ कर्मो से,
धरा को क्षति पहुचाते है।
आभार और उपकार छोड़,
बस शोषण करते जाते हैं।
हो जायें सजग इन कुकृत्यों से,
प्रकृति पुन: संवारें हम।
अनुग्रह देकर पृथ्वी को,
प्रकृति पुन: पुकारें हम ।


