प्रेम कुसुम दे कर मुझको,

ये चंचल मन विह्वल कर दो।

ले जाओ मुझको प्रेम डगर,

और कलुषित मन पावन कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


विश्राम तनिक दो संयम से,

सूने जीवन से आस नहीं।

एकबार पकड़ कर हाथ मेरा,

इस जीवन को सावन कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


कुण्ठा से सिंचित मोह जाल में,

फँस भ्रमित हुआ जाता हूँ मैं।

आशाओं के नव दीप जलाकर,

ये मोह जाल भसम कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


ठहरे पानी सी हुई भावना,

तन दूषित और मन कलुषित है।

एकबार हृदय से लग कर तुम

मैला आँचल धावन कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


उथले सरोवर की भाँति नित्य मैं,

उफनाता और उमड़ता हूँ।

दो बूँद प्रेम की डाल यहाँ ,

सरोवर को सागर कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


भय चिन्ता और एकाकीपन से,

एक व्यथित घुमक्कड लगता हूँ।

उद्देश्य नया देकर मुझको,

बारिश से बादल कर दो।।


प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....


दो वह अनुभव जो एक फक़ीर की,

क्षण-क्षण सुख पहुंचाता है।

भर कर मुझकौ बाँहों में तुम,

ये जलती आग हवन कर दो।।



प्रेम कुसुम दे कर मुझको.....