मज़हबी माहजबीं माशूक तो हज़ारो हैं
इस पाक़ सर ज़मीं पर
देखना ये हैं कि
इन्सानीयत की रिवायत कौन करता है।
गाहक़ लाखों तैयार बैठे हैं
क़ौमी जिहाद पर मर मिटने को
देखना ये है कि
मोहब्बत की हिमायत कौन करता हैं।
घूमते है लाखों
सर कटाते मज़हबी शरीयतों पर
देखना ये है कि
सर झुकाने की सिफारिश कौन करता है।
सवाल उठाते फिरते हैं
एक दूसरे की पहचान पर सभी
देखना ये हैं
जवाब देने की गुज़ारिश कौन करता है
तख्त पर बैठे वज़ीर
ये खेल खेलते जा रहे हैं
देखना ये है कि
खेल का अन्ज़ाम मुक़म्मल कौन करता है
यूँ तो हर गाफ़िल
खुद को मुल्क़ परस्थ कहता फिरता है
देखना ये है कि
मिट्टी का हक़ अदा कौन करता है


