ये हसीन चाँद आज मुझसे कुछ खफ़ा सा लगता है

तेरी बगैर हर ख्वाब बेवफ़ा सा लगता है

पानी के बुलबुले की तरह हो गये हो तुम

तेरे लौट आने का ख्याल एक हवा सा लगता है

तेरी मोहब्बत भरी यादों की अमानत इस तौर से सज़ायी है

तुझको पाने का जुनून एक नशा सा लगता है

तेरे हुस्न की दोधारी तलवार से मै इस कदर घायल हूँ

कि इन जख्मों पे मरहम भी एक जफा सा लगता है

तुम्हारी खूबसूरत बाहों में क़ैद एक परिन्दा हूं

सरगोशी में ये ख्याल भी एक हया सा लगता है

तुम फिर आकर इज़हार-ए-मोहब्बत बयाँ करोगे

तन्हाई में ये ख्याल कुछ नया सा लगता है

दिल में तेरे लिये हज़ारों बातें है मगर लबों पर कुछ भी नही

इस क़दर हाल-ए-दिल बयाँ करना कहकशाँ सा लगता है।

बगैर गुफ्तगू के चले गये हो इतनी दूर

ये तस्लीम करना बेगुनाह मुलजिम को सज़ा सा लगता है

तेरे बिना ये जिस्म जान के बगैर चल तो रहा है

लेकिन तेरी यादों का रंगीन शर्बत अब एक मज़ा सा लगता है