लिख सकते हो तो लिखो सर्द रात में जमते हुए शरीर की यंत्रणा और पथराई आँखों का दुःख। धंसे हुए पेट और झलकती पसलियां हड्डियों पर चढ़ी खाल की एक मात्र परत की आस भरी आँखों से मिला सकते हो आँखें तो लिखो। अपंग डिग्रियों के लिए बनी नौकरी नामक बैसाखी, न खरीद पाने के अवसाद में झूलती लाश और हारते जीवन का मर्म समझा सकते हो लिखो। बस्ते के बोझ तले दबा बचपन और मंहगी शिक्षा के तले रौंदी जाती प्रतिभाओं के अंधकारमय भविष्य में उम्मीद की लौ जला सकते हो तो लिखो। धर्म-कर्म के नाम पर दंगों में बेघर होते निर्दोष को न्याय दिला, इंसानियत को खा पेट भरते हैवानों को सबक सिखा सकते हो तो लिखो। जानते हो कलम की ताकत तो डर से बाहर निकलो, और पतझड़ में भी फूल खिला सकते हो तो लिखो, जीने की अलख जगा सकते हो तो लिखो॥