जाने कब से कैद है इस बाजार में, शायद अंदर ही अंदर घबराती वो।

कितनी बार बेंचा है खुद को हवस की दुकान में, पर हर बार पहली सी कतराती है वो।

किसी अपने से मिलने की आस में, पराई भीड़ में बेनाम हो जाती है वो।

अपने बहते अश्रुओं को आँखों में छिपाकर, घर उनका काजल से सजाती है वो।। 

कहीं कोई पढ़ ना ले लबों कि शिकायतें, तो उन पर गहरा लाल रंग भी लगती है वो।। 

चमकीले रंग के वस्त्र पहन कर, खुद को सितारों सा जगमगाती है वो।। 

फिर कहीं बयाँ ना हो जाए हकीकत रोशनी से, तो चेहरे पर एक झूठी मुस्कान भी लगाती है वो।। 

बला सी खूबसूरत बनकर, खुद को बड़ा बेखौफ बताती है वो।। 

पर सामाजिक रीबायतों की इस भीड़ में, ना जाने कितनी आँखों से डर जाती है वो।

कुलटा, वैश्या, कसबी न जाने ऐसे, कितने नामों को बडे प्यार से अपनाती है वो।। 

पर फिर भी इस स्वार्थी समाज में, एक अछूत कतवार सी देखी जाती है वो।।


- अंकिता सिंह चौहान