हादसा शायद कुछ बड़ा होगा।

वो शक्स जो जल्दी घर से निकला था, 

कहीं दूरी पर शायद रुका होगा।। 


बेहतर था कुछ आगे बढ़ जाये। 

पर होनी को शायद कुछ नया सुझा होगा।। 


बादलों में छिपते निकलते चाँद सा नज़ारा था। 

सर्द हवाओं का कोई संदेश भी उसको छुआ होगा।। 


कोहरे की धुँध में जहाँ सब छुपा था। 

कोई खुद अपनी रोशनी से यहाँ जल रहा होगा।। 


सवाल, जवाब, एहसास सब एक साथ थे। 

पर शायद कोई सुनने के लिए ना बचा होगा।। 


कहीं उठता, कहीं बैठता बेचैन सा चलता वो

सबसे मिलने पर इक मुस्कान से खुद को छिपा रहा होगा।। 


समुंदर भी चांदनी सा दमक रहा था। 

शायद कोई अपने सारे राज उस सुना रहा होगा।। 


कितना अकेला होगा वो इस कामयाबी की भीड़ में।

जो वक्त बेवक्त खुद में खुद से ही लड़ रहा होगा।।


हर बार आन्दुरुनी कलह से संभलता रहा। 

और कई बार शायद खुद से खुद को बचाया भी होगा।। 


कुछ तूफान सा होगा शायद उसके अंदर।

जो बिना किसी से मिले वो खुद को अलविदा कह रहा होगा।।


- अंकिता सिंह चौहान