केसे कह दूँ नींद को की आ जा अब, मुलाक़ात होगी उनसे ख़्वाबों में

वो ख़्वाबों का वक्त भी कोई वक्त है जो हम संग में बिताया करते है

केसे कह दूँ अपनी पलकों को की कुछ घड़ी तो आराम कर ले

वो ख़्वाबों का वक्त ही सही पर कम स कम उनका दीदार तो नसीब होता है

पर अब ये ख़्वाब सताने से लगे, हक़ीक़त नहीं ये जताने से लगे

वो रात का समय अब  अधूरा सा लगता है 

तेरा सपनो में आना क्यों बिछड़ना सा लगता है

अब नहीं देखना ख़्वाब वो जिसमें हाथ तेरा हाथ में हो

अब नहीं जीना रात वो जिसमें मुक्कमल वो मुलाक़ात ना हो

ऐसे ही कह दिया दिल को की बस अब छोड़ भी दे,

 वो दूनिया ख़्वाबों की जो तुज़े जगाए रखते है

बस अब जी भी ले उस लम्हे को जिसमे तूँ अपना आज छुपाए रखते है

दिल कहा मानने वाला था, बड़ी ख़ुदगर्ज़ी से कहने लगा

क्या ख्वाइश काफ़ी नहीं हमारी की यें हाथों का सफ़र हमसफ़र बन जाए?

क्या इश्क़ हमारा मुराद नहीं वो जो असम्भव सी ज़हमत उठायें?

हमें चुप्पी थमा के दिल तो अपना लौट गया उस ख़्वाब में

और हम कुछ कह ना पाए और बिता दी रात उसी हालात में