इस कोलाहल भरी सड़कों पर
निगाहें जाती है अनगिनत अंजान चेहरों पर
लोग बेतहाशा भाग रहे हैं
कहां के लिए, क्यों भाग रहे हैं
है कुछ नहीं पता
है जाना कहां, ये भी नहीं पता
सब अस्त व्यस्त किंतु व्यस्त हैं
किसी के भी पास ना ख़ुद के लिए वक्त है
ना किसी और के लिए समय
ना जीवन की गति में कोई सार्थक लय
लेकिन फ़िर भी सब अपने अपने संकुचित संसार में
भटक रहे है लक्ष्य विहीन, तन्हा है बैठे आभासी संसार में
सामान्य-विचित्र है ये सब.!
किंतु सत्य है ये सब..!

