भाव शून्य हो जाता है मनुष्य एक समय के बाद
कार्य नहीं करता है विवेक उसका
नहीं आता है समझ कुछ उसे
कि करें क्या
क्योंकि मस्तिष्क की मार्ग से
खो चुका होता है सब कुछ और
बात मान कर हृदय की
समाप्त कर चुका होता है अस्तित्व आत्मा का
हो जाता है मनुष्य यंत्रवत
ना वेदना रहती है ना संवेदना
कर्म करते हुए निष्काम रहते हुए वर्तमान में
समय की निरंतर, सतत धारा में बहते हुए
प्राप्त होता है जो भी गर्भ से भविष्य की
चाहे वो विषकुंभ हो या अमृत धारा
करता उसे स्वीकार है
बिना कोई उपेक्षा के, बिना कोई अपेक्षा के