मैंने देखा उसे तब मानो मेरी
घड़ी की सुइया रुक सी गई हो
कॉलेज की पार्किंग में मानो
सपनो का मेला सा लग गया हो
फिर चला बातों का दौर जैसे मैं चाय
और वह मुझ में गिरी शक्कर हो
फिर व्हाट्सएप फेसबुक इंस्टाग्राम
सब जगह उसी उसी के मैसेज हो
रात हो या दिन बस मिलन की कल्पनाएं
उसके जहन से मेरे जहन में हो
इतना हुआ कि हमने नाम सोच लिए
बच्चों के चाहे किस्मत में मिलना ना हो
अचानक से मन ऊब गया जैसे कोई
गैर मुझ से ज्यादा भा गया हो
कुछ पल में रोया पर बस वहीं से
मैंने खुद को खो दिया था
हर वक़्त उसे ही चाहा और
उसी को अब खो दिया था
अब बस रोज रात को मुलाक़ात होती है
कुछ पल ही समझा पाया मैं खुद को
फिर मौत से मिलने चला था
जैसे कोई जिन्दा लाश
राख होने को बेताब हो....
~ अंकित ''अ:निरुद्ध''
