
हर रोज की तरह बस कूछ चंद लम्हे ही शेष थे अंधेरे को अपने चरम पर पहुंचने में और हर बार की तरह आज फिर मेरा जिस्म मेरे काबू में नहीं था ज्यो ज्यो अंधेरा बढ़ता जा रहा था मैं अपने शरीर से अपना काबु खो रहा था बदन में अजीब ही झनझनाहट थी मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि जिस्म पर ज़हन का काबू क्यों नहीं है मेरे जहन में एक उसी की तस्वीर बनती जा रही थी मेरे कदम मेरे जिस्म और जहन को उस अंधेरी सकरी गली के अंतिम छोर पर बनी दो मंजिला इमारत जो बिल्कुल खंडहर सी हो चुकी थी , के अंदर हो रहे उन स्मरणीय पलों से मिलाने के लिए बेताब थे मेरे कदम खुद-ब-खुद उस खंडहर को मंजिल मान चल पड़े थे जैसे मानो में बस उसी चीज का आदि हूं और मेरे कदमों ने मेरे जिस्म को उस मंजिल से रूबरू कराने की ठान ली थी में अंधेरे में उस सकरी गली में धीरे धीरे चलता गया मेरे पीछे मेरे कदमों की आवाज ही मेरे कानों में गूंज रही थी मैं जब
