हर रोज की तरह बस कूछ चंद लम्हे ही शेष थे अंधेरे को अपने चरम पर पहुंचने में और हर बार की तरह आज फिर मेरा जिस्म मेरे काबू में नहीं था ज्यो ज्यो अंधेरा बढ़ता जा रहा था मैं अपने शरीर से अपना काबु खो रहा था बदन में अजीब ही झनझनाहट थी मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि जिस्म पर ज़हन का काबू क्यों नहीं है मेरे जहन में एक उसी की तस्वीर बनती जा रही थी मेरे कदम मेरे जिस्म और जहन को उस अंधेरी सकरी गली के अंतिम छोर पर बनी दो मंजिला इमारत जो बिल्कुल खंडहर सी हो चुकी थी , के अंदर हो रहे उन स्मरणीय पलों से मिलाने के लिए बेताब थे मेरे कदम खुद-ब-खुद उस खंडहर को मंजिल मान चल पड़े थे जैसे मानो में बस उसी चीज का आदि हूं और मेरे कदमों ने मेरे जिस्म को उस मंजिल से रूबरू कराने की ठान ली थी में अंधेरे में उस सकरी गली में धीरे धीरे चलता गया मेरे पीछे मेरे कदमों की आवाज ही मेरे कानों में गूंज रही थी मैं जब मंजिल तक पहुंचा तो मेरे सामने मेरी मंज़िल मानो निर्वस्त्र एक मेज पर खड़ी थी मैंने पल भर में ही उसे अपनी आगोश में ले लिया मैं उसकी हर एक एक बूंद को अपने होठों से गले में उतारता गया और उसका हर एक-एक कतरा मानो मेरी रूह से मिल रहा हो और एक अलग ही सुख का आनंद ले रहा हूं मैं बस उसी में डूबता गया और कुछ देर बाद उसके नशे ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया और मैं लड़खड़ाते कदमों से वहां से घर को आने की कोशिश कर रहा था मेरे कदम लड़खड़ाए मैं गिरा पर मैं फिर से चला और हाथ में उस शराब की बोतल जिसे में मंजिल मान चला था को ऐसे पकड़ रखा था मानो जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को सर्द रातों में पकड़े हो और वो भीतर मन से तृप्त हो चुका हो अब मै आंखों को बंद करना चाहता हूं धीरे-धीरे बाहर निकलता हूं उस खंडर से और फिर धीरे धीरे अपने घर की और चलता जाता हूँ...


     ~ अंकित "अ:निरुध्द"