कहाँ ढूंढे हम अब वो अपनापन,
हर रिश्ता यहाँ बन गया है एक दर्पण।
जो दिल के करीब थे, दूर हो गए,
ख़ामोशी में छुपे हैं हज़ारों जलन।
न वो बातें रही, न वो एहसास हैं,
अब रिश्तों में दिखते हैं बस दिखावे के रंग।
कभी जो पलकों पे थे, दिल में बसे,
आज गैरों की महफ़िल में बैठे हैं संग।
हमने तो चाहा था थोड़ा सा प्यार,
मगर मिला सिर्फ तन्हाइयों का आँगन।
अब न कोई अपना, न कोई सहारा,
बस यादों में जलते हैं बुझते हुए दिये हर दम।

